Monday, September 26, 2022
Home उत्तराखंड ‘जी रये जाग रये’ – भाई को च्यूड़े का टीका लगाने और आशीष देने का त्यौहार हैI

‘जी रये जाग रये’ – भाई को च्यूड़े का टीका लगाने और आशीष देने का त्यौहार हैI

उत्तराखंड: कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया अर्थात दीवाली के दो दिन बाद भैया दूज या भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है। समूचे उत्तराखंड में भी इस त्यौहार की बड़ी मान्यता है। भाई बहन के प्रेम का प्रतीक यह त्यौहार यम द्वितीया भी कहलाता है।

इस त्यौहार के यम द्वितीया के नाम से मनाये जाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार यमुना ने अपने भाई यमराज को कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन भोजन पर आमंत्रित किया। माना जाता है कि यम और यमुना भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया के बच्चे थे। विवाह के बाद यमुना बार-बार अपने भाई को अपने घर आने को कहती है लेकिन अपनी व्यस्तता के चलते यम को अपनी बहन का यह आग्रह बार-बार टाल देना पड़ता है।

अंततः उस दिन यमराज अपनी बहन के घर जाते हैं। इस शुभ कार्य से पहले वे सभी नरक-वासियों को मुक्त कर देते हैं। उनके इस कृत्य के बारे में जानकार बहन यमुना बहुत प्रसन्न होती हैं और कहती हैं कि आज के दिन अपने भाई का टीका करने व उसे भोजन करवाने वाली बहन को कभी भी यम का (अर्थात मृत्यु का) भय नहीं होगा।

कुमाऊं-गढ़वाल में इसे दुत्ती त्यार, भ्रातृ-टीका या भैया दूज नाम से भी मनाते है। इस दिन बहन अपने भाई का टीका च्यूड़ों से करती है। इन च्यूड़ों को कुछ दिन पहले तैयार करने रख दिया जाता है। इन्हें बनाने के लिए पहाड़ी लाल धान को भिगो और हल्का भून कर ओखली में कूटना पड़ता है. चावल पिचक कर दोहरे हो जाते हैं। इन्हें ही च्यूड़ कहते हैं।

च्यूड़ों से टीका करने का अनुष्ठान पर्वतीय समाज की एक अनूठी रस्म है। हाथ में दूब और च्यूड़े पकड़ कर टीका करने वाले के पैर, घुटने और कंधे का क्रमशः स्पर्श कर उन्हें सिर पर धरा जाता है. ऐसा एक से तीन बार किया जाता है। ऐसा करते हुए लम्बी आयु की कामना तथा बार-बार भेंट करने को आने की इच्छा करते हुए आशीष दिया जाता है –

“जी रये जाग रये
स्याव जस चतुर है जाये, बाग जस बलवान है जाये,
आकाश जस उच्च है जाये, धरती जस चौड़ है जाये
दूब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइए
हिमाल में ह्यूं छन तक, गंगज्यू में पाणी छन तक
यो दिन यो मास भेटने रये”

इस दिन पहाड़ी रसोइयों में सूजी से निर्मित होने वाला सिंगल नामक पकवान अवश्य बनाया जाता है। रक्षाबंधन की ही तरह यह त्यौहार भी बहुत भावनात्मक महत्व का है और पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में इसे अब भी बहुत उत्साह से मनाया जाता है। लगातार होते शहरीकरण और पलायन के कारण इसकी चमक और जीवन्तता में लगातार कमी आती जा रही है। यदि भाई बहन के गाँव-शहर में नहीं रहता था तो उसे डाक से लिफ़ाफ़े में रखकर च्यूड़े भिजवाये जाते थे। जिसके बदले में उचित समय आने पर भाई बहन को समुचित उपहार इत्यादि देता था।

आधुनिकता के आने के साथ साथ अब लिफ़ाफ़े भेजे जाने भी बंद हो गए हैं। व्हाट्सएप पर ग्रुप मैसेज भेजे और फॉरवर्ड किये जाने जैसी निरर्थक और संवेदनाहीन परम्पराएं पुरानी चीजों को हाशिये में खिसका कर अपने लिए जबरन जगह बना रही हैं।

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