Monday, September 26, 2022
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भारतीय हिन्दी सिनेमा का सफर- एक सामाजिक संदर्भ

सिनेमा अपने आप में ही एक यथार्थ का प्रारम्भ है। सिनेमा समाज का प्रतिनिधि नहीं बल्कि प्रतिबिम्ब है। जैसे-जैसे समाज बदलता है, सिनेमा भी बदलता है अगर भारतीय हिन्दी सिनेमा के समाजशास्त्र का एतिहासिक अध्ययन करे तो इसकी शुरुआत मूक फिल्मों से हुई। 28 सेप्तंबर, 1895 को लुमियर बन्दुओं ने एसी मशीन से परिचित कराया जो तस्वीरों को चलता दिखा सकती थी। इससे सिनेमा जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन एक तथ्य के अनुसार मूक युग में 1288 फिल्मों का निर्माण हुआ। इनमें से सिर्फ 13 फिल्में ही राष्ट्रिय अभिलेखागार में शामिल हैं।

20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर को देखा जाए तो भारतीय जीवन पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। अंग्रेजों की शोषणकारी व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक विसंगतियाँ और आडंबर अपने चरम में था। इस समय की अधिकतर फिल्मे चाहे वह दादा साहब फाल्के की, राजा हरिशचन्द्र या कालिया दर्शन हो, हिमांशु राटा की प्रेम सन्यास या जी0 वी0 पँवार की गुलामी का पातन हो, एन सबने भारत में सामाजिक, धार्मिक, एतिहासिक और पंचतंत्र जैसे विषयों के साथ-साथ भारत में राष्ट्रवादी लोकतान्त्रिक विचारधारा को प्रेषित करने का प्रयास किया, आजादी के बाद का सिनेमा भारत-पाकिस्तान त्रासदी के दौर का सिनेमा था। जिस भारत को हमने पाया वह लहूलुहान था, कराह रहा था। सामंतवादी शोषणकारी व्यवस्था भी अपने चरम पर थी। अतः कौमी एकता बनाने के साथ-साथ सामंतकारी व्यवस्था पर कुठाराघात करने का प्रयास इस दौर के सिनेमा ने किया। पड़ोसी जैसी फिल्मों का निर्माण हुआ। जिनसे यह संदेश देने का प्रयास किया कि पड़ोसी सिर्फ पड़ोसी होते हें न कि हिन्दू व मुसलमान।

1960 के दशक में समाजवादी व्यवस्था का बोलबाला था। ग्रामीण समाज और कृषक अर्थव्यवस्था भारतीय समाज कि रीड़ थी। इस समय के सिनेमा में भी समाजवाद के प्रभाव के कारण सामाजिक समस्याओं और देशभक्ति पर आधारित फिल्मों का निर्माण तेजी से हो रहा था। ग्रामीण पृष्टभूमि पर आधारित फिल्में भारतीय हिन्दी सिनेमा का प्रतिनिधित्व कर रही थी नया दौर, तीसरी कसम, सारा आकाश , गंगा-जमुना, जागते रहो जैसी फिल्में अपने समाज को रेखांकित कर रही है। 1960-80 का दशक भारत ने चीन व पाक युद्ध भी देखा, लाल बहादुर शास्त्री का जय जवान, जय किसान उद्घोष भी देखा, राष्ट्रिय आपातकाल और राजनैतिक अस्थिरता का दौर भी देखा, अगर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यही वह समय था। जब भारतीय सिनेमा में ग्रामीण पृष्टभूमि का स्थान धीरे-धीरे शहरी पृष्टभूमि ने ले लिया, मेरे देश की धरती, उपकार, रोटी कपड़ा और मकान जैसे यथार्थ परक ( Reality based ) फिल्मों का निर्माण हुआ।

1990 के दशक के शुरुआती चरण में भारत ने भूमंडलीयकरण की प्रक्रिया अपनायी गयी। भूमंडलीयकरण ने आज सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्रों के साथ-साथ आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया है भूमंडलीयकरण का प्रभाव भी सिनेमा में देखा जा सकता है। पहले जहाँ सिनेमा के केंद्र में स्त्री का चेहरा था वहीं आज सिनेमा में स्त्री की देह है। 21वीं सदी में हिन्दी सिनेमा नारी का देह प्रदर्शन, नारी मुक्ति का पर्याय बन गया है।

90 के दशक शुरू होने से फले नारीवादी चिंतक सिंथिया स्नेलों ने भूमंडलीयकरण के समर्थक से सवाल किया की तुम्हारी व्यवस्था में औरत कहाँ है? इसका जवाब यह नज़र आता है कि नारी को सिर्फ बाजारवाद के हवाले कर दिया गया। 21वीं सदी के सिनेमा ने 20वीं सदी के आखिरी दशक तक स्त्री के संदर्भ में बनी सीमाओं को तोड़ दिया है। चाँदनी बार, लज्जा, चमेली, चीनी कम, फ़ैशन, निशब्द, डरटी पिक्चर जैसी फिल्मों ने इस बात को प्रमाणित किया है। हिन्दी सिनेमा अश्लीलता के मुददे पर अधिक मुखर होने लगा है। जो आधुनिक हिन्दी सिनेमा समाज को उसी तरह प्रतिबिंवित करता है। जिस तरह वह है। आदर्श और नैतिकता के नाम पर उसमें कुछ छुपाया नहीं जाता। दलित समाज, जनजाति समाज और समाज के अन्य वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व भी भारतीय सिनेमा कर रहा है। समलैंगिकता और लिव इन रिलेशनसिप जैसे मुद्दे में आज अछूते नहीं है। आज भारतीय सिनेमा और साहित्य समसामयिक मुद्दे को रेखांकित किया गया है। भारतीय सिनेमा के सफर का अगर समाजशास्त्रीय अध्ययन करने से स्पष्ट है कि इसमे भारतीय समाज कि छाप है आज आवश्यकता है कि भारतीय सिनेमा का तार्किक और समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाए। –(मोहित उप्रेती)

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